नदी ने सागर से पूछा – क्या तुम किसी की प्यास बुझा सकते हो..?
सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ.रंजना फतेपुरकर की सकारात्मक संदेश देती लघुकथा

सागर … एक लघुकथा
इठलाती नदी झूमती,बलखाती बही जा रही थी।कल कल करता नदी का जल जैसे खुशी से छलछला रहा था।किनारे पर कभी वह पेड़ों को,लताओं को भिगोता तो कभी
पनिहारिनो की मटकी में प्यास बुझाने का मीठा स्त्रोत बन जाता।
आज नदी अपने गुण दोषों को तिरोहित कर स्वयं सागर के अस्तित्व में विलीन होने जा रही थी।लंबा रास्ता तय कर,अनेक बाधाओं को पार कर आखिर नदी सागर तक पहुंच ही गई।
सागर का अभिमान उच्छल तरंगें बन आकाश छूने का यत्न कर रहा था।वह गर्व में डूबी आवाज़ में नदी से बोला –
“नदी,आज तक तुम एक छोटी सी नदी थीं,लेकिन मुझमें मिलकर तुम भी विशाल सागर ही कहलाओगी। तुम जैसी कितनी ही छोटी छोटी नदियां मुझमें मिलकर सागर का रूप ले लेती हैं।तुम्हें सागर का रूप देने के लिए तुम्हें मेरा ऋणी होना चाहिए।”
सागर की अभिमान भरी बातें सुन समर्पण की भावना में आकंठ डूबी नदी का आत्मसम्मान आहत हो उठा।नदी के समर्पण को अनदेखा कर उसे अपमानित कर सागर उसे तुच्छ साबित करने की कोशिश कर रहा था।
नदी ने शांत स्वर में उत्तर दिया –
“हां सागर,तुम बहुत विशाल हो,तुम्हारा ओर छोर तक दिखाई नहीं देता,तुम उस क्षितिज तक को छू लेते हो जहां धरती आसमान से मिलती है,तुम्हारे हृदय की गहराई में अनेक मूल्यवान रत्न बिखरे हुए हैं।पर एक बात तो बताओ क्या तुम्हारी अथाह जलराशि का चुल्लू भर पानी भी किसी प्यासे की प्यास बुझा सकता है…..?
( लेखिका इंदौर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार , लेखक और रचनाकार डॉ रंजना फतेपुरकर है )
