आप लड़ते रहो , मै सुलह करवाता रहूंगा, नोबल जो चाहिए
सुप्रसिद्ध लेखक विश्वास व्यास का शानदार लेख

बचपन से मुझे लोगों के झगड़े सुलझाने का शौक है। हुआ यूं कि मैने गलती से कही पंचतंत्र की वो कहानी पढ़ ली थी। जिसमें एक बंदर दो बिल्लियों के झगड़े में दोनों के हिस्से की रोटी खा लेता है।
आप लोगों ने उससे क्या सीख ली, मै नहीं जानता! लेकिन मुझे इतना समझ आया कि यदि बिना कुछ किए रोटी खानी है तो बंदर ही बनना चाहिए। झगड़ा दूसरे का, इनाम की रोटी अपनी ! वो भी बिना कुछ किए!
मै इस कहानी से मिली सीख को आज तक चला रहा हूं।
मै दिन रात इस तलाश में रहता हूं कि कहां दो लोग झगड़ रहे है? जर, जोरू, जमीन हो या सोशल मीडिया की पोस्ट, मै शिकारी कुत्ते की तरह झगड़ा सूंघता रहता हूं। जैसे ही कोई झगड़ा शुरू हुआ, मै कोशिश कर के उसे बढ़ाता रहता हूं। ताकि बाद में जब मै सुलह करवाऊं तो नाम और इनाम दोनों बड़ा मिले।
वैसे बात ये भी है कि झगड़े में सारी दुनिया की दिलचस्पी होती है। दो भाई प्रेम से रह रहे हो तो बताइए इसमें दुनिया के लिए क्या मजा है? सुबह शाम प्रेम और शांति से एक तरह की बोरियत होने लगती है। असली आनंद लड़ाई झगड़े में है, अशांति में है। प्रेम में एकरसता है, विवाद में सारे रस समाए हुए है। कभी घृणा, कभी करुणा, कभी शोक, कभी उत्साह! और विवाद जब सड़क पर आ जाए तो “रसराज” हो जाता है। नौ रस मिलकर भी उस से मिलने वाले आनंद की बराबरी नहीं कर सकते।
सोचिए, जब दो लोग एकदूसरे को भला बुरा कह रहे हो, एक दूसरे के छुपे राज जाहिर कर रहे हो तो तमाशा किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम रोमांचक नहीं होता। राजनीति हो, क्रिकेट हो या फिल्म टेलीविजन की दुनिया, हर जगह झगड़े की TRP सबसे ज्यादा है। प्रेम की बात केवल खबर बनती है, झगड़ा ब्रेकिंग न्यूज होता है। यदि लोग लड़ाई झगड़ा न करे तो दुनिया बेनूर, बेरंगी और बेगानी सी लगने लगे। पुराने जमाने में इसे ही सभ्य भाषा में शास्त्रार्थ कहते थे। संवाद की सार्थकता तभी है जब वह विवाद में बदल जाए। इसलिए मेरे जैसा विद्वान विवाद प्रेमियों ने स्कूलों में ” वाद विवाद” को एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटी में स्थान दिया होगा। ताकि बच्चा स्कूल से तर्क वितर्क और कुतर्क करना सीख कर उम्र भर झगड़े का आनंद लेता रहे। स्नेह से साथ रह रहे दो लोगों में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती। उनके बीच लड़ाई होते ही शहर भर में उनकी चर्चा गर्म हो जाती है। इसी से साबित होता है कि मनुष्यता की सारी कमाई लड़ाई ही है। प्रकृति भी इसमें मदद करती है। आदमी तो स्वभाव से आक्रामक माने गए है, और लड़कियों के बारे में तो हमारे नेता कह ही चुके है ” लड़की है लड़ सकती है!”
जब समाज चुनाव के नारे तक में लड़ने लड़ाने की बात स्वीकार करता है तो मुझे अपने सुलह करवाने के स्टार्ट अप की संभावनाएं आसमान छूती नजर आती है।
ज्यादातर लोग मेरी तरह यह राज की बात जानते है। इसलिए आप देखिएगा की जब सड़क पर, मोहल्ले में या ऑफिस में जब झगड़ा शुरू होता है तो शुरू में सुलह करवाने कोई नहीं जाता। तमाशा देखने कई सारे खड़े हो जाते है। जब झगड़े से आज के आनंद की जय का अहसास होने लगता है तब कही एक दो सुलहवीर आकर शो स्टॉपर बन जाते है। ये अलग बात है कि वे झगड़े की शुरुआत में भी ऐसा कर सकते है। पर क्लाइमैक्स का एक्साइटमेंट उन्हें ऐसा करने नहीं देता।
सोशल मीडिया ग्रुप्स में तो यह काम और ज्यादा सुख देता है। बिल्कुल मल्टीप्लेक्स की तरह आप लग्जरी के साथ IPL यानि “इनकी पोस्ट वाली लड़ाई” एंजॉय कर सकते है। मै तो भाई चप्पल उलटी कर हाथ में पॉपकॉर्न लिए लंबी पूछ वाला चार्जर मोबाइल में लगाकर बैठ जाता हूं। मैने तो एक दो गुप्त नंबर ले कर फर्जी नामो से प्रोफाइल बना रखे है। जिन से ऐसे विवादों की आग में घी नहीं पेट्रोल डालने का काम होता है। लेकिन अंत में मैं अपनी असली पहचान से सुलह करवा कर कई ग्रुप्स एडमिन से सम्मान प्राप्त कर चुका हूं।
पर जीवन की अनिश्चिता के कारण यहां भी कई बार झगड़े के सुखा पड़ जाता है। लोग शांति से रहने लगते है। ऐसे में हम जैसों की जान संकट में आ जाती है कि हाय, तमाशा न हुआ! ऐसे में मै खुद प्रयास कर के दो लोगों के कान भरता हूं ताकि झगड़ा शुरू हो और मुझे इनाम मिलता रहे।
इनाम पाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। वैसे लोग समझते है कि यह धंधा बड़े आराम का है। पर यकीन जानिए किसी को प्रेम में शामिल करवाना आसान है पर झगड़े करवाने में बड़ी करामात लगती है। लोगों की कमजोरिया, उनके राज और उनकी कही बातें याद रखनी पड़ती है। और वे बाते चटनी मसाले के साथ दूसरे को परोसनी होती है। तब कही जाकर कच्चे कानो की परत से पका हुआ झगड़ा निकलता है।
असली परीक्षा उसके बाद होती है जब सुलह इस तरह करवानी पड़ती है कि दोनों पक्षों को लगे कि जीत उनकी ही हुई। बिना किसी की हार के दोनों को ” विक्ट्री शील्ड” पा लेंने का अहसास करवाने का काम तो महाभारत में भी नहीं हुआ था। जीत भी हो जाए और झगड़ा भी बना रहे, यह संतुलन बनाना, रॉकेट साइंस के बराबर की कारीगिरी मांगता है। लेकिन दोस्त, हम सुलहवीर ही है कि शांति का महत्व समझाने के लिए अशांति करवाने का सितम भी हंसकर झेलते है और इनाम पाते है।
अब तो कई लोग भी मेरी इस काम में मदद करने लगे है। सौतन दुश्मन से छुटकारा दिलाने वाले वशीकरणी बाबा लोगों की तरह मेरा भी नाम सुलह कराने वालों में प्रसिद्धि हासिल कर चुका है। यहां तक कुछ समय पहले तक यूएनओ भी मेरे संपर्क में था। वे दुनिया के झगड़े सुलझाने के लिए मुझे सुलह मंत्रालय देना चाहते थे। पर मुझसे पहले ट्रंप साहब ने यह काम करना शुरू कर दिया। वे बड़े स्मार्ट बिजनेसमेन है, कमाई करने के अवसर जल्दी पहचान लेते है। उन्होंने मुझसे पहले यह काम वैश्विक स्तर पर शुरू कर दिया और नोबेल के दावेदार बने! छोटे झगड़े का इनाम छोटा और बड़े झगड़े का बड़ा। जितनी शकर डालो, उतना मीठा होता है। मेरी शक्कर की चाशनी जरा ढीली रह गई। वरना मेरी वजह देश में शांति का नोबल आ सकता था।
खैर मैं निराश नहीं हूं। मुझे आप लोगों की झगड़ने की क्षमता पर पूरा यकीन है। सुलह करवाते हुए एक न एक दिन मेरा नाम भी नोबल के लिए जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो झगड़ा करने का विकल्प तो खुला ही है। शांति के नोबल के लिए अशांति का बल काम आ ही जाएगा।
तब तक आप लोग झगड़ते रहिए ताकि देश के नोबेल की उम्मीद कायम रहे।
( लेखक , सुप्रसिद्ध रचनाकार, व्यंग्यकार इंदौर के विश्वास व्यास है )
