खामोश निगाहें और गुलाब पर बारिश की बूंदे
सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. रंजना फतेपुरकर के मन की बात

यादों का सिलसिला
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तुमने मुझे जो सुर्ख गुलाब
उपहार में दिया था
वो उपहार नहीं
मेरी सांसों को महकती
यादों का सिलसिला दिया था
वो सुर्ख गुलाबों की भीनी भीनी महक थी
जो कविता की पुस्तक में गुलाबी यादों से
सजी थी
तुम अपने मन की बात
खामोश निगाहों से मुझे सुना दो
या गुलाबों पर ठहरी बारिश की बूंदों से मुझे
भिगो दो
मुझी से मुझको चुरा लिया है तुमने
ये निराला अंदाज़ शायद चांद ने सीख लिया है तुमसे
आओ इस गुलाबी महक को चांद की नज़र कर दें
और संग संग मुस्कुराहटों का सफर तय कर लें
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( लेखक डॉ रंजना फतेपुरकर ,इंदौर की सुप्रसिद्ध लेखिका , साहित्यकार और रचनाकार है )
