पहली नजर का धोखा

लेखक इंदौर के सुप्रसिद्ध रचनाकार, व्यंग्यकार विश्वास व्यास है है

पता नहीं लोग क्यों कहते हैं कि पहली नजर में प्रेम हो जाता है। मैंने तो पहली, दूसरी, यहां तक कि सौवीं नजर तक कोशिश की है। पर अफसोस, प्रेम कभी नहीं हुआ। हां, एक-आध बार कंजक्टिवाइटिस ज़रूर हुआ है। साफ है, पहली नजर का प्रेम महज अफवाह है। 

यहां तो हालत ये है कि पहली नजर में लेफ्ट टर्न भी ठीक से दिखाई नहीं देता। आदमी मुड़ता पहले है, इंडिकेटर बाद में देता है। ऐसे में पहली नजर में प्रेम की बात करना न्यायसंगत नहीं लगता।

वैसे भी, नजर कोई मोबाइल रिचार्ज तो है नहीं कि “पहली नजर” के बाद उसकी वैलिडिटी खत्म हो जाएगी। आप दूसरी, तीसरी, हजारवीं नजर डालो, फिर आराम से प्रेम करो। कोई दिक्कत नहीं है। नजर का स्टॉक भरपूर दिया है भगवान ने! 

यही कारण है कि मेरे पुरुष साथी हर नजर को पहली नजर मानते हैं। भले ही वह नजर हज़ारवीं बार डाली गई हो, प्रेम के प्रति उनका आग्रह वही रहता है जो पहली नजर में होता है।

खुद की सूरत भगवान ने भले ही कम इंक वाले खराब प्रिंटर से धुंधली या काली निकाली हो, भाई लोग सपने तो कोरियन-रशियन ही देखते हैं। इस मामले में स्वदेशी के प्रयासों यानी Make in India पर इनका कोई भरोसा नहीं होता। ये अलग बात है की यथार्थ में आना यही पड़ता है।

जबकि स्त्रियों के यहां बात कुछ गंभीर होती है। उन्हें पता है कि पहली नजर में धोखा भी हो सकता है। इसलिए वे इस छलावे में नहीं आती। 

मुझे लगता है कि वे प्रेम में स्नेह, समर्पण और सुरक्षा चाहती होंगी। स्त्रियां तो सब्जी में बतौर खटाई डलने वाले टमाटर को भी पांच बार ठेले से उठाकर देखती हैं। वे उसका रंग, बनावट, गुणवत्ता को दस बार उलट-पलट कर देखने के बाद ही चुनती हैं। जब एक वक्त की सब्जी के लिए इतनी गहरी परीक्षा ली जाती है, तो प्रेम जैसी महत्वपूर्ण बात को स्त्रियां एक नजर में निपटा देती होंगी — ऐसा लगता नहीं है।

पहली नजर के जादू की बात करने वाले कभी किसी स्त्री के साथ साड़ियों की दुकान पर जाएं, तो उन्हें पता लगेगा कि — “बेटा! नजर किस बला का नाम है?” सारी दुकान गद्दी पर बिछने के बाद भी दुकानदार को उसी नजर का इंतजार होता है, जिसे पसंद कहते हैं। स्वयं सिद्ध हो जाएगा कि पहली नजर में प्रेमी पसंद करने की बात फिजूल का शोशा है। 

इन सबूतों के मद्देनज़र, प्रथम दृष्टया मुझे पहली नजर में प्रेम का दावा खारिज करने योग्य लगता है।क्योंकि दृष्टि है तो दृष्टि भ्रम भी है। रेगिस्तान में प्यासे को पानी यानी मरीचिका नजर आती है। कई बार पहली नजर के प्यासे भी ऐसे ही भ्रम में मारे जाते है।

मेरा सवाल ये भी है कि आखिर पहली ही नजर में प्रेम क्यों करना? इतनी जल्दबाजी क्यों? जबकि बचपन से सुनते आए हैं कि “जल्दी का काम शैतान का होता है।” प्रेम तो भगवान से मिलाने वाली पवित्र भावना है। प्रेम में धैर्य की आवश्यकता होती है। यह कोई ट्रेन तो है नहीं कि जल्दी नहीं की तो छूट जाएगी!

स्त्री-पुरुष की नजर में भी अंतर होता है। स्त्रियां स्वभाव से भली और प्रेमिल होती हैं। पुरुष भी भला हो या न हो, पर प्रेमिल तो इतना होता है कि हर तरफ, हर जगह बस प्रेम ही तलाशता है। पुरुष बस ढाई अक्षर पढ़ कर इम्तिहान देना चाहता है। स्त्री पूरी किताब पढ़ना चाहती है। यह उनका स्वभाव है और हर वर्ष के परीक्षा परिणामों से सिद्ध भी है।

 इधर वाली आधी यानि पुरुष आबादी नजर-वजर के चक्कर में नहीं पड़ती। सीधे-सीधे अपना दिल उछालती चलती है — बिल्कुल भंडारे के प्रसाद की तरह! जिसे सेवादार सड़क पर गाड़ियां रोक-रोक कर बांटते रहते हैं।

कई मामलों की तरह, यह भी हमारी सरकारों की कमी है कि प्रेम करने की कोई मान्य प्रक्रिया कभी जारी नहीं की गई। कानून और प्रक्रिया के अभाव में बेचारे प्रेमी अराजकता का शिकार हो रहे हैं। जाहिर है, यह सरकारों की बड़ी नाकामी है। 

कई लोग परंपरा को कानून मान कर पहली नजर में प्रेम कर बैठे हैं, और जीवन भर के लिए नजर और नज़ारे दोनों से वंचित हैं। उनका प्रेम को लेकर नजरिया ही बदल गया है।

इधर मेरे जैसे कई लोग बाजार में दिल लिए, दिन में लाख पचास हजार स्त्रियों पर नजरें घुमाते फिर रहे हैं। कमबख्त प्रेम है कि होता ही नहीं। 

मुझ जैसों की पहली नजर के जादू को न मानने वाली स्त्रियां लोकतंत्र को ठेस पहुंचा रही हैं। इससे संविधान की समानता की भावना संकट में है। क्योंकि किसी को तुरंत प्यार मिल जाता है तो किसी को स्थाई इंतजार!  

मैंने इस संकट को दूर करने के लिए SOP — यानी Standard Operating Practice — बनाई है। सरकार चाहे तो जनहित में इसका उपयोग कर सकती है। 

SOP के चरण इस प्रकार होंगे:

सबसे पहले आदमी का हुलिया स्कैन किया जाएगा। लुक्स कैसे हैं? बाल कैसे संवारता है या संवारती है? ऐसे सौंदर्य आधारित पैमाने पूरे होने पर नजर का अगला दौर शुरू होगा। फिर आएगा — पद, प्रतिष्ठा और पैसे का चरण।

प्रेम के पपहरे में यही अगला स्तर होगा।

क्योंकि प्रेम में पद, प्रतिष्ठा, पैसे के अनुप्रास का असली अलंकार — “पैकेज” होता है।

एक अच्छा पैकेज आपके लिए पहली नजर में तो नहीं, पर उसके बाद वाली किसी नजर में प्रेम का बोनस ला सकता है।

यहां स्मरण रखें — सौंदर्य और पैकेज को एक-दूसरे से रिप्लेस किया जा सकेगा। दोनों मिल जाएं तो समझिए कि पिछले जन्म में आपने मोती बांटे थे। न मिलें तो जानिए कि तब बांटे गए मोती प्लास्टिक के रहे होंगे।

 अंतिम चरण में विवाह की बात की जा सकती है — जो सामाजिक रूप से प्रेम का शिखर बिंदु है।

विडंबना यह है कि शिखर पर पहुंचने के बाद ढलान आता है।

बहुत से प्रेम उसी ढलान पर फिसल कर ‘समझौते’ के मैदान में आकर रुकते हैं। बस यही ध्यान रखने की जरूरत है कि यहां नजर न तो फिसले और न ही खराब हो। चाहे कुछ हो प्रेम का नजरिया बरकरार रखना होगा।

नजरिया ठीक होगा तो जिंदगी के नजारे बरकरार रहेंगे,

और आपके प्रेम को “नजर” भी नहीं लगेगी —

भले ही प्रेम पहली नजर का हो या सौवीं नजर का ! 

प्रेमीगण इसे ही “पहली समझ” मान लें —

तो प्रेम और प्रेमी — दोनों खुश रहेंगे। 

– विश्वास व्यास, इंदौर

( लेखक , सुप्रसिद्ध लेखक, व्यंग्यकार ,साहित्यकार है)

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