इन कमियों की वजह से अग्निपथ का विरोध

अग्निपथ के तहत केवल तीन महीने की ट्रेनिंग की बात कही गयी है। जबकि सेना के जानकारों का कहना है कि केवल तीन महीने में किसी को इस तरह से प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता कि वह मुक़्क़मल सैनिक बन सके। एक मुक्कमल सैनिक बनने के लिए पांच से सात साल का वक्त लग जाता है। भारतीय वायु सेना में एयरमैन और नौ सेना में नाविक बनने के लिए तकनिकी कौशल के साथ अनुभव की जरूरत होती है। इस तरह की काबिलियत महज छह महीने में नहीं आने वाली। इसके लिए लम्बा वक्त लगता है। अगर ऐसे लोगों की भरमार होगी, जिन्हें केवल चार साल के लिए सेना में शामिल किया जाएगा और चार साल बाद सेना से बाहर कर दिया जाएगा तो आगे चलकर उन पेशेवर सैनिकों की संख्या में भी कमी आएगी जो कम से कम पांच साल की ट्रेनिंग की बाद मुक़्क़म्मल सैनिक बनते हैं। मतलब राष्ट्रीय हित दांव पर लगाकर इस नियम को सेना में लाया गया है।
सेना की तैयारी करने वाले नौजवान कह रहे हैं कि केवल चार साल की नौकरी के लिए सेना में शामिल हुए अग्निवीर जंग के दौरान सेना में अपनी जान गंवाने के लिए तैयार नहीं होंगे। मान लीजिये जंग शुरू हो गयी तो क्या कोई अग्निवीर यह नहीं सोचेगा कि केवल चार साल की नौकरी के खातिर हम अपनी जान क्यों दांव पर लगाएँ? जैसे ही जंग सामने दिखेगी तो कई अग्निवीर इस चुनाव में झूलेंगे कि वह चार साल की नौकरी बचाने के लिए जंग पर जाएं या जंग में अपनी जान का खतरा देखकर चार साल की नौकरी छोड़ दें। जिनकी एक साल की नौकरी बाकी होगी, उसमें से अधिकतर शायद यही फैसला लेंगे कि जंग में जान गंवा देना ठीक नहीं। बहुत ज्यादा बवाल और विरोध होने के बाद वन रैंक वन पेंशन लागू हुआ। अग्निपथ योजना के तहत शामिल होने वाले अग्निवीरों को किसी भी तरह का रैंक नहीं दिया जाएगा। ना किसी को किसी तरह की रैंक मिलेगी और ना ही पेंशन दिया जाएगा। सरल शब्दों में कहा जाए तो अग्निपथ योजना के तहत नो रैंक नो पेंशन लागू किया जा रहा है।

पांचवी कमी – कई लोग कह रहे हैं कि अग्नीपथ योजना के अलावा रेगुलर भर्ती होती रहेगी। मतलब पहले से जो भर्ती प्रक्रिया चलती आई है, वह भर्ती प्रक्रिया चलती रहेगी। इसके अलावा अग्निपथ योजना के तहत 4 सालों के लिए सेना में शामिल किया जाएगा। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऑफिसर रैंक से नीचे की भर्ती के लिए अग्निपथ योजना के अलावा किसी भी तरह की भर्ती नहीं होगी। कोई भी रेगुलर भर्ती नहीं होगी। केवल एक ही एंट्री सिस्टम होगा जिसका नाम अग्निपथ योजना है।
अग्निपथ योजना के तहत हर साल 45 से 50 हजार के बीच भर्तियां निकलेंगी। मतलब एक ही झटके में सरकार ने सेना में शामिल होने वाले सैनिकों की संख्या कम कर दी है। 2 साल से तकरीबन डेढ़ लाख से ज्यादा भर्तियां खाली थीं। लेकिन अब वहां भर्ती नहीं होगी। केवल 46 हजार भर्ती होने जा रही हैं।
कई लोग कह रहे हैं कि 4 साल की नौकरी के बाद एकमुश्त 11 से 12 लाख रुपए मिलेगा। यह बहुत बड़ी राशि है। लेकिन यहाँ यह बात समझने वाली है कि यह पैसा देने के लिए सरकार हर महीने सैनिकों की आय में से 30त्न काटेगी। मतलब 30 हजार सैलरी नहीं मिलेगी। 30 हजार के बदले 21 हजार हाथ में आएँगे और ?9 हजार हर महीने सरकारी भविष्य निधि खाते में जमा किया जाएगा। जहां सरकार की तरफ से भी पैसा जमा होगा। यह दोनों मिलाकर और ब्याज जोड़कर 4 साल के बाद 11 लाख से ?12 लाख दिए जाएंगे।
आठवीं कमी – अमूमन हर साल केवल थल सेना में 60 हजार भर्तियां होती हैं। यह 60 हजार पक्की नौकरियां होती थीं। परमानेंट नौकरियां होती थीं। लेकिन अब हर साल तकरीबन 50 हज़ार भर्तियां होंगी। यह भी पक्की नौकरियां नहीं बल्कि कच्ची नौकरियां होंगी। 4 साल के लिए होंगी। 4 साल बाद इनमें से 25त्न को परमानेंट के तौर पर शामिल किया जाएगा। मतलब पहले आर्मी में 60 हजार सलाना पक्की भर्तियां हुआ करती थीं। अब यह संख्या कम हो करके महज 12 से 13000 हो गई हैं। यानी अग्निवीर योजना के साथ बहुत बड़े स्तर पर नौकरियों की संख्या कम की गई है। अग्निपथ योजना से पेंशन पर खर्च होने वाली बहुत बड़ी राशि बच जाएगी। इसका इस्तेमाल सेना के आधुनिकीकरण और तकनीकी करण में किया जाएगा। सरकारी समर्थकों के जरिए पेश किए जा रहे इस तर्क की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां पर सैनिकों को दी जाने वाली पेंशन को फिजूलखर्ची के तौर पर दिया देखा जा रहा है।

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