” फ्री की राजनीति’ कहीं देश की नैय्या न डूबो दे “
फ्री की रेवड़ी बांट रही सरकारें ...!
पिछले कई सालों से यह फ्री की राजनीति अपने चरम पर है कहीं जनता के बड़े बड़े बिजली बिल माफ हो रहे हैं तो कहीं महीनों का राशन फ्री में बंट रहा है।कहीं बिना किसी शुल्क के बसों में यात्री फ्री में यात्रा कर रहे हैं। फ्री की रेवड़ी बांटने में कोई भी पार्टी पीछे नहीं है चाहे वो आम आदमी पार्टी हो , कांग्रेस हो , बीजेपी हो या कोई ओर। राजनीतिक पार्टियों ने तो जैसे सत्ता पाने के लिए फ्री की योजनाओं को अपना ब्रह्मास्त्र बना लिया है।
हाल ही में पंजाब में आप सरकार ने घोषणा कर दी है कि वह जुलाई से सभी रहवासियों को 300 यूनिट बिजली फ्री में उपलब्ध करवाएगी। इसके इतर यदि फैक्ट्स पर बात की जाए तो पंजाब सरकार पर तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज पहले से ही है।अब सवाल यह उठता है कि इतने कमजोर आर्थिक हालातों के चलते पंजाब सरकार इन फ्री की सुविधाओं के लिए आवश्यक संसाधन कहां से जुटा पाएगी? और बिलकुल यही सवाल उन सभी सरकारों से भी है जो जनता को नित नए फ्री योजनाओं के प्रलोभन दे रही है। कोई फ्री में लैपटॉप बांटने का वादा कर रहा है तो कोई घरेलू महिलाओं को 3000 रुपए महीना भत्ता तो कोई 1000 रुपए बेरोजगारी भत्ता।
देश के युवाओं को रोज़गार देने की बातें नही हो रही है। नाही कोई विशेष बातें नए उद्योग,नए कौशल को बढ़ावा देने की हो रही हैं।होड़ मची है तो बस कौन कितना अधिक से अधिक हर सुख सुविधा फ्री में मुहैया करवा सकता है।
जनता में नए तकनीकी ज्ञान को विकसित करने की बातें नही हो रही जिससे आर्थिक और तकनीकी स्तर पर सभी आत्म निर्भर बनने की ओर कदम बढ़ाएं। बात हो रही है तो बस ये फ्री वो फ्री।और इस देश की भोली जनता भी पल दो पल की सुविधा या स्वार्थ के मायाजाल में फंसती चली जा रही है।
यदि बात करें अपने पड़ोसी देश श्रीलंका की तो श्रीलंका भी मुफ्त की राजनीति के चक्कर में कंगाली बदहाली और भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारत के कई राज्य भी लोकलुभावन घोषणाओं के कारण बदहाली के कगार पर पहुंच गए हैं। जल्दी कदम नहीं उठाए गए तो भारत में भी श्रीलंका जैसे हालात होने में देर नहीं लगेगी।
यदि मुफ्त में खर्च किये गए धन को सुनियोजित तरीके से रोज़गार के नए अवसर पैदा करने, बाँध व झीलों जैसे बुनियादी ढाँचे के निर्माण और कृषि को प्रोत्साहन देने के लिये उपयोग किया जाता है तो यह बात तय है के आज जो हमारे देश पर आर्थिक संकट मंडरा रहा है, जो लाखों युवा बेरोजगार है साथ ही मंहगाई भी दिनों दिन बढ़ती जा रही है इन सभी दिशाओं में देश की स्थिति बेहतर होगी।आमजन को नई दिशा मिलेगी और निश्चित रूप से राज्य का सामाजिक उत्थान और प्रगति होगी।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इस मामले में आवश्यक रूप से हस्तक्षेप कर कोई कड़ा कदम उठाने की जरूरत है जिससे राजनीतिक पार्टियों की मनमानी पर लगाम लगे।क्योंकि मुफ्त की रेवड़ी और जनकल्याण योजनाओं में फर्क है। क्योंकि कहीं न कहीं ये नेतागण जनता को वोटों के लिए कर्म के मार्ग से विचलित कर रहे हैं,बिना कर्म किए ही इंसान को फल मिलता रहेगा तो वो अपनी शक्ति जो की पुरुषार्थ है उसे भूलकर पराधीन हो जायेगा। और फिर इंसान को मेहनत करके आगे बढ़ने में कोई रुचि नहीं होगी ।और ऐसी जनता एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य का निर्माण करने में असफल रहेगी।
लेखक – परिधि रघुवंशी
