खरी खरी : इंदौर एक रेलगाड़ी , जिसके एक दो नहीं बल्कि छह इंजन है

उपेक्षा का शिकार हो रहा अपना इंदौर

अनदेखा दौर,

इग्नोर… इग्नोर… इग्नोर… 

और हमारा इंदौर

शायद ही देश में कोई ऐसा शहर होगा, 

जो इतनी संभावनाओं के बावजूद इतनी उपेक्षा का शिकार हुआ हो, 

जितना हमारा इंदौर होता जा रहा है

कभी देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में पहचान बनाने वाला इंदौर आज एक ऐसी रेलगाड़ी बन गया है, 

जिसमें एक-दो नहीं, 

पूरे छह इंजन लगे हुए हैं, 

लेकिन विडंबना देखिए 

की वह रेलगाड़ी आज भी आउटर पर खड़ी है

पहला इंजन – सांसद

जनता ने उम्मीदों के साथ चुना, 

लेकिन शहर की समस्याओं पर उनकी सक्रियता दिखाई नहीं देती… 

सड़कों पर जाम बढ़ते जा रहे हैं, 

फ्लाईओवर वर्षों से पूरे होने का इंतजार कर रहे हैं, 

और जनता सवाल पूछ रही है ?

कि आखिर सांसद कहाँ है ?

जनता ने भारी उम्मीद से जिताया 

उम्मीद थी की दिल्ली में

इंदौर की आवाज बुलंद होगी..

लेकिन शहर पूछ रहा है

सांसद कहा है ?

दूसरा इंजन – महापौर

बैठकों का दौर जारी है, 

लेकिन जमीन पर बदलाव की गति उतनी दिखाई नहीं देती…

यदि स्वयं यह स्वीकार करना पड़े कि अधिकारी बात नहीं सुनते, 

तो फिर सवाल व्यवस्था पर भी उठता है

अगर अधिकारी ही नही सुन रहे है

तो फिर शहर की कमान किसके हाथ में है ?

तीसरा इंजन – मंत्री

शहर को सरकार में प्रतिनिधित्व तो मिला, 

लेकिन क्या शहर को उसका लाभ मिला ? 

यदि मंत्रियों को भी अपनी बात सुनवाने के लिए पत्र लिखने पड़ें, 

तो स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है

यह व्यक्तिगत पीड़ा नहीं

पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है,

चौथा इंजन विधायक,

इंदौर के अधिकांश विधायक सत्ता पक्ष से हैं

जनता को उम्मीद थी 

की विकास कार्यों में तेजी आएगी…

लेकिन आम नागरिक आज भी ट्रैफिक, 

गड्ढों और अव्यवस्था से जूझ रहा है 

जनता पूछ रही है 

कि विकास का रोडमैप आखिर कहाँ है ?

विधायको का काम 

मुख्यमंत्री को एयरपोर्ट से लाने ले जाने का रह गया है

पांचवां इंजन – पार्षद

यह सच है 

कि कई पार्षद अच्छा काम कर रहे हैं, 

लेकिन शहर की समग्र तस्वीर अभी भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती…

मोहल्लों की समस्याएँ आज भी लोगों के धैर्य की परीक्षा ले रही हैं,

और छठा तथा सबसे महत्वपूर्ण इंजन

केंद्र सरकार

योजनाओं और बजट की कमी नहीं है

घोषणाएँ भी होती हैं, 

संसाधन भी उपलब्ध कराए जाते हैं, 

लेकिन सवाल वही है 

यदि सब कुछ है, 

तो जमीन पर परिणाम क्यों नहीं दिखते ?

आज इंदौर की स्थिति यह है कि सड़कों पर गड्ढे हैं,

हर प्रमुख चौराहे पर जाम है,

फ्लाईओवर अधूरे हैं,

सर्विस रोड खोजने पर भी नहीं मिलती,

वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा चुकी है,

ट्रैफिक सिग्नलों का पालन करना लोगों ने लगभग छोड़ दिया है

आखिर ऐसा क्यों ?

एक शहर के विकास के लिए आखिर कितने इंजन चाहिए ??

और यदि छह इंजन भी किसी शहर को गति नहीं दे पा रहे, 

तो समस्या इंजन की संख्या में नहीं, 

बल्कि उनकी दिशा और प्राथमिकताओं की है

स्थिति इतनी चिंताजनक है कि अब केवल जनता ही नहीं, 

बल्कि सत्ता के भीतर बैठे लोग भी अपनी उपेक्षा की बात सार्वजनिक रूप से उठाने लगे हैं,

इंदौर को आखिर किसकी नजर लग गई ?

इंदौर को अब भाषण नही चाहिए..

फ़ोटो सेशन नही चाहिए..

रील बाज एक्टर नही चाहिए..

स्वागत सत्कार की राजनीति नही चाहिए

इंदौर को चाहिए

समाधान जवाबदेही ओऱ वास्तविक विकास,

क्योंकि इंदौर की जनता

अब वादे नही

परिणाम देखना चाहती है

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, 

बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्न है, 

जिसके बीच आम नागरिक रोज संघर्ष कर रहा है

सोचिएगा जरूर… 

क्योंकि शहर केवल सरकारों से नहीं, 

नागरिकों की चिंता और जवाबदेही से भी बनते हैं

( लेखक देवेंद्र चौहान, इंदौर , जो अपनी निष्पक्ष लेखनी के चलते काफी लोकप्रिय है)

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