वो सनातन मजबूत करने क्या निकला , कुछ को दर्द हो गया
सुप्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर के पुत्र देवांश के सनातनी प्रयास पर बड़ा प्रश्न चिन्ह !
दूसरों के घर में झांकने की आदत कब छूटेगी ?

आजकल कुछ लोगों को इस बात से बहुत परेशानी हो रही है कि प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर अपने पुत्र देवांश को भी कथावाचक बना रहे हैं..
प्रश्न यह है, की आखिर परेशानी किस बात की है ?
जब देश के बड़े उद्योगपति अपने बच्चों को अपनी कंपनियों का उत्तराधिकारी बनाते हैं,
तब किसी को आपत्ति नहीं होती..जब राजनीति में पिता के बाद पुत्र नेतृत्व संभालते हैं,
तब भी समाज सहज रूप से उसे स्वीकार कर लेता है
लगभग हर पिता अपने अनुभव,
संसाधन और परंपरा को अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करता है
फिर यदि कोई कथावाचक अपने पुत्र को अपनी ही परंपरा और ज्ञान की विरासत सौंप रहा है,
तो उसमें आपत्ति कैसी ?
ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जा रहा है
तो गलत क्या है ?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि एक पिता अपने बेटे को क्या बनाना चाहता है,
इसका निर्णय समाज करेगा या स्वयं पिता ?
यदि देवकीनंदन ठाकुर ने अपने पुत्र देवांश को 19 वर्ष की आयु में कथावाचक बनाया है,
तो आखिर लोगों के पेट में दर्द क्यों हो रहा है ?
उन्होंने अपने बेटे को कोई अपराधी, गुंडा या समाज विरोधी तत्व तो नहीं बनाया,
उन्होंने उसे धर्म, संस्कृति और अध्यात्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है
कुछ लोग कथावाचन की फीस पर भी सवाल उठाते हैं…
यदि कोई कथावाचक अपनी लोकप्रियता,
ज्ञान, वक्तृत्व कला और लाखों लोगों को आकर्षित करने की क्षमता के आधार पर 10-15 लाख रुपये का पारिश्रमिक प्राप्त करता है,
तो इसमें गलत क्या है ?
जब एक क्रिकेटर एक मैच के करोड़ों रुपये ले सकता है,
जब फिल्म अभिनेता एक विज्ञापन के लिए करोड़ों रुपये प्राप्त कर सकते हैं,
तब एक लोकप्रिय कथावाचक के पारिश्रमिक पर ही सवाल क्यों ?
और यदि किसी को पैसा खर्च करके कथा नहीं सुननी,
तो आज यूट्यूब पर हजारों कथाएं निःशुल्क उपलब्ध हैं…
किसी को रोक किसने रखा है ?
लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट कथावाचक को बुलाना चाहता है,
तो उसका पारिश्रमिक उसकी लोकप्रियता और मांग के अनुसार ही होगा यही हर क्षेत्र का सामान्य नियम है।
कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि बेटे को IAS या डॉक्टर क्यों नहीं बनाया गया..
यह सोच ही अपने आप में संकीर्ण है
क्या इस देश में सफलता का एकमात्र पैमाना UPSC या मेडिकल प्रवेश परीक्षा है ?
क्या 19 वर्ष की आयु में लाखों लोगों के सामने मंच पर खड़े होकर श्रीमद्भागवत कथा का वाचन करना,
संस्कृत के श्लोक कंठस्थ करना और लगातार कई दिनों तक प्रभावशाली प्रवचन देना कोई साधारण कार्य है ?
यह भी एक प्रकार की तपस्या, साधना और कठोर परिश्रम है
ओऱ आपको लगता है
ये एक सामान्य कार्य है
तो आप भी श्लोक याद करके
भागवत कथा करो..
लाखो कमाओ रोका किसने है ?
वास्तविक समस्या कथा से नहीं है।
समस्या इस बात से है कि एक सनातनी परिवार अपने पुत्र को धर्म और संस्कृति के मार्ग पर आगे बढ़ा रहा है
यदि यही युवा मॉडलिंग करता, फिल्म उद्योग में जाता या सोशल मीडिया पर मनोरंजन सामग्री बनाता,
तो संभवतः वही लोग उसकी प्रशंसा करते,
लेकिन जब कोई युवा धर्म का प्रचार करता है,
तो कुछ लोग उसे “धंधा” कहने लगते हैं
यही दोहरा मापदंड समाज की सबसे बड़ी विडंबना है
आखिर देवांश ने ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया ?
न कोई नशा, न कोई आपराधिक गतिविधि,
न कोई सामाजिक विवाद इसके विपरीत,
उन्होंने कम आयु में धर्म, संस्कृति और अध्यात्म के प्रचार का मार्ग चुना और पवित्र स्थलों पर भागवत कथा का वाचन किया,
इससे अधिक सम्मानजनक और सकारात्मक कार्य क्या हो सकता है ?
विडंबना यह है कि जिन लोगों के अपने बच्चे मोबाइल गेम, नशे और दिशाहीनता की ओर बढ़ रहे हैं,
वे दूसरों के संस्कारी बच्चों पर प्रश्नचिह्न लगाने में व्यस्त हैं
और अंत में,
यह हमारे सनातन समाज की सामर्थ्य का भी प्रमाण है
कि आज भी लाखों लोग धर्म, कथा और संस्कृति से जुड़े हुए हैं
और यह सनातन की ताकत ही है
की हम कथावाचक को
10 से 15 लाख दे पा रहे है
तथा उसे सम्मान और समर्थन देने की क्षमता रखते हैं…
किसी युवा को धर्म और संस्कृति के मार्ग पर आगे बढ़ते देख प्रसन्न होना चाहिए,
न कि उसके विरुद्ध अनावश्यक आलोचना का अभियान चलाना चाहिए
( लेखक इंदौर के सुप्रसिद्ध और निष्पक्ष विचार रखने वाले देवेंद्र चौहान है )
