किसी जरूरतमंद की मदद ही परमात्मा की सच्ची भक्ति है

सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. रंजना फतेपुरकर की "पूजा" एक लघुकथा

सुबह सुबह अखबार की चटपटी खबरों पर नज़र डाल ही रही थी कि सुमी बाई ने परदे के पीछे से थोड़ा झांक कर पूछा–

    “भाभी जी मैं हर महीने आपके पास जो रुपए जमा करती हूं मुझे आज चाहिए।”

    “हां ले लो पर आज ऐसी क्या जरूरत पड़ गई?”

     सुमी बोली –”भाभी जी मेरे गांव की देवी को चूनर और पूरा सुहाग चढ़ाना है।गांव में हर कोई चढ़ाता है पर मेरे पास कभी इतने रुपए एक साथ नहीं रहे,वो तो हर महीने आपके पास थोड़ा थोड़ा करके जमा करती रही तो अब मैं भी चढ़ा पाऊंगी।”

    बरसों की आस पूरी कर पाने की उम्मीद से सुमी का चेहरा खुशी से दमक रहा था।दो दिन की छुट्टी का बोल सुमी चली गई।

    दूसरे दिन सुमी की छुट्टी याद कर अखबारों में साड़ियों और गहनों के आकर्षक विज्ञापनों का मोह छोड़ किचन में जाने ही वाली थी कि सुमी की आवाज़ आई।

    “भाभी जी।”

    मैंने चौंक कर देखा सुमी दरवाज़े पर खड़ी थी।

    मैंने खुशी मिश्रित आश्चर्य से पूछा–”अरे सुमी तुम?तुम तो देवी का सुहाग चढाने गांव जाने वाली थीं न,फिर क्या हुआ?”

    सुमी पास आकर बैठ गई।बोली–”गई तो थी पर एक ऐसी घटना घटी कि रास्ते से वापस लौटना पड़ा।”

    “ऐसी क्या घटना घटी कि तुम अपनी पूजा भी न चढ़ा सकी।”

    सुमी बोली–”पता नहीं देवी मां क्या चाहती हैं? कल शाम बस से गांव के लिए निकले ही थे कि एक युवती और उसकी मां जल्दी जल्दी बस में चढ़े।मेरे पास ही युवती आकर बैठ गई।युवती की मां मुझसे बोली–”मेरी बेटी लक्ष्मी अपने ससुराल जा रही है।इसके बापू बीमार हैं इस लिए अकेले ही भेज रही हूं।अगर आप इसका जरा खयाल रखेंगी तो मैं निश्चिंत हो जाऊंगी। मैंने स्नेह से लक्ष्मी के सर पर हाथ फेर कर कहा_”आप चिंता न करें मैं भी उसी गांव जा रही हूं इसे सुरक्षित पहुंचा दूंगी।”

     “रास्ते में बातचीत करते हुए वह मुझसे काफी हिलमिल गई थी।अभी एक घंटा ही हुआ था कि एक बैलगाड़ी को बचाने में बस एक पेड़ से टकरा गई।लक्ष्मी का सिर बस की खिड़की से टकराया और खिड़की का शीशा टूटकर उसके माथे में धंस गया।माथे से खून तेजी से बहने लगा।लक्ष्मी आधी बेहोशी की हालत में थी।मैं तुरंत उसे लेकर उसी गांव में उतर गई।कुछ लोगों की मदद से उसे अस्पताल में भर्ती कराया।लक्ष्मी को टांके लगाए,ग्लूकोस की बोतल चढ़ाई। अस्पताल वालों ने हज़ार रुपए मांगे।मैं दुविधा में पड़ गई।एक तरफ मेरी बरसों की साध थी दूसरी ओर वह मासूम अपनी नीम बेहोशी की हालत में थी।या तो मैं पूजा चढ़ाती या फिर उस मासूम का इलाज करवाती।मैं मन ही मन गांव की देवी का स्मरण करने लगी।अचानक मुझे लगा जैसे देवी मां का चेहरा लक्ष्मी के चेहरे  

में बदल गया और देवी मां कहने लगीं–”बेटी!तुम्हारी तरफ से मुझे सुहाग की पूजा मिल चुकी है। किसीके दुःख में मदद करना ही सच्ची पूजा है।”

    “बस फिर मैने लक्ष्मी का इलाज करवाया।उसकी मां को बुला कर लक्ष्मी को सौंपा।लक्ष्मी की मां पैसे देने लगी पर मैंने मन ही मन गांव की देवी मां को प्रणाम किया और पैसे लेने से इंकार कर दिया और वापिस लौट आई। मैंने ठीक किया न भाभी जी?”

    मैं अवाक हो सुमी का चेहरा देखती रह गई।वह एक अनपढ़ महिला होकर कितने साधारण तरीके से असाधारण बात कह गई  , और मन ही मन यह प्रेरणा जगा गई कि किसी दुःखी इंसान का दुःख दूर करना ही सच्ची पूजा है।

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( लेखक डॉ रंजना फतेपुरकर , इंदौर की सुप्रसिद्ध कथाकार, रचनाकार है )

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