सृजन हमेशा वंदनीय – एक लघुकथा

डॉ रंजना फतेपुरकर , इंदौर की कलम से

सृजन – लघुकथा

    झील में हंस,हंसिनी के साथ अठखेलियां कर रहा था।कभी अपने भीगे पंखों से हंसिनी पर फुहारों की वर्षा करता तो कभी सोचता कमल पत्तों पर थिरकती ओस के मोतियों से हंसिनी का शृंगार करूं।लाल,गुलाबी,नीले कमल हंसों की जोड़ी देख खुश हो मुस्करा रहे थे।तभी हंस ने देखा झील के किनारे एक मूर्तिकार आकर बैठा।उसने किनारे की मिट्टी उठाई और थोड़ी देर में अपने कुशल हाथों से शिव की नटराज रूप में एक सुंदर सी मूर्ति का निर्माण कर दिया।मूर्ति इतनी सजीव लग रही थी कि लगता था शिव अभी तांडव नृत्य करने लगेंगे।

    हंस ने हंसिनी से कहा –

    “हंसिनी,मेरे सामने दो सृजन कर्ता हैं।एक ओर ईश्वर हैं जिन्होंने मिट्टी से इंसान का सृजन किया है और दूसरी ओर इंसान है जिसने मिट्टी से ईश्वर का ही निर्माण कर दिया है। मैं बड़ी सुविधा में हूं,किसको नमन करूं?”

    हंसिनी ने कहा~

    “आओ हम ईश्वर और इंसान दोनों को ही नमन करें,क्योंकि सृजन हमेशा वंदनीय होता है।”

    दूसरे ही पल हंस और हंसिनी दोनों सृजनकर्ताओं को श्रद्धा से नमन कर रहे थे।

( लेखक डॉ रंजना फतेपुरकर , इंदौर, सुप्रसिद्ध कहानीकार , लेखक, कवि , रचनाकार और जानी मानी साहित्यकार है )

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