रिश्ता… एक अनोखी कविता
इंदौर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार वंदना पुणतांबेकर की कलम से

रिश्ता….
तेरा मेरा रिश्ता है जन्मों का रिश्ता
रक्त से सिंचा,स्नेह से पाला ,ममता से दुलारा।
कभी-कभी जब मैं खामोश हो जाती हूं।
तेरे स्नेह भरे नयन सवाल करते।
मेरी खामोशी में छुपे दर्द को पढ़ लिया करते।
बस यूं ही अपनी गोद में लेटाकर मेरा दर्द पढ़ते।
ममता का स्पर्श भरा वो तेरा हाथ।
जब उलझे बालों को सुलझाता।
बस बरबस ही आंखों से आंसू टपक जाता।
कुछ कहती नहीं मैं फिर भी ।
मन की वेदना सहज ही समझती।
हंसती हूं कभी खिलखिलाती हूं तो तुम्हारे चेहरे पर नूर झलक जाता।
मेरे मन के कोने का छिपा हर भाव तुम्हें समझ आता।
एक रिश्ता जो बातों से कम एहसासों से ज्यादा जुड़ा हो।
वह बस एक मां बेटी का रिश्ता।
जो सदियों से नहीं बदला, समय ,युग, कैलेंडर बदल गए ।
यह रिश्ता बस वहीं कायम रहता।
अटखेलियों सा तेरा-मेरा रिश्ता,जन्मों का रिश्ता ।

– लेखक इंदौर की सुप्रसिद्ध लेखिका वंदना पुणतांबेकर है । )
