…ओर चांद ने लिख दी चकोर के लिए इबारत
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ . रंजना फतेपुरकर की लघुकथा चाहत के गीत

चाहत के गीत (लघुकथा)
सितारों जड़े नीले अम्बर में पूर्णिमा का चांद झिलमिला रहा था।चांदनी भी अपना रुपहला घूंघट ओढ़े चांद के संग संग सितारों की राह पर चल रही थी।तभी उसने देखा चकोर चाहत का हौसला अपने पंखों में भर चांद को छूने के लिए उड़ान भर रहा था।पर वह बार बार उड़ान भरता और बार बार उसके नन्हे नन्हे पंख थक कर निढाल हो जाते।चांदनी चकोर को देख द्रवित हो चांद से बोली–
“प्रिय चांद!देखो चकोर बार बार उड़ान भरकर आपको छूने का यत्न कर रहा है और असफल हो रहा है।आप उसे बता क्यों नहीं देते कि आपके और उसके बीच की असीमित दूरी इतनी बड़ी कठिनाई है कि वह कभी आपको छूने का यत्न न करे।”
चांद ने मुस्कराकर कहा–
“चांदनी मैं चकोर के हौसले को कभी नहीं कहूंगा कि उसकी कठिनाइयां इतनी बड़ी हैं बल्कि उसकी कठिनाइयों को कहूंगा कि चकोर का हौसला कितना बड़ा है।”
दूसरे ही पल चांद ने तारांकित आकाश में चकोर के हौसले के नाम इबारत लिख दी कि जब जब दुनिया चांद का नाम ले चकोर का नाम साथ साथ ही जुड़ जाए।
( लेखक, डॉ.रंजना फतेपुरकर इंदौर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कथाकार और रचनाकार है )
