नन्हा परिंदा तूफान से बोला – डाली पर नहीं अपने पंखों पर भरोसा है
सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ.रंजना फतेपुरकर की बेहतरीन लघुकथा

“नन्हा परिंदा”(लघुकथा)
तूफान को अपने प्रचंड रूप पर बेहद गर्व था।वह सोचता था उसके चलते ही हर पेड़ का पत्ता पत्ता सिहर उठता है,डाली डाली भय से कांप उठती है।आज फिर तूफान का मन हो रहा था तबाही मचाने का।वह सागर के पास से गुजरा,उसे देखते ही सागर में ऊंची ऊंची तरंगें उठने लगीं,कश्तियां भय से डोलने लगीं।कई वृक्ष तूफान ने धराशाई कर दिए।तभी तूफान को वृक्ष की डाली पर एक नन्हा सा परिंदा खुशियों के गीत गुनगुनाता दिखा।तूफान ने सोचा कितना नादान है ये नन्हा परिंदा जो तूफान की विभीषिका को नहीं जानता।वह परिंदे को अपने भीषण इरादों का रौब दिखाते हुए बोला –
“ऐ नन्हे परिंदे!मेरे संहारक रूप से तू शायद अपरिचित है तभी डाली पर बैठा खुशियों के गीत गुनगुना रहा है।तू अपनी जान बचा ले क्योंकि मेरे तूफानी वेग से वही डाली टूटने वाली है जिस पर तू निश्चिंत बैठा चहचहा रहा है।”

नन्हे परिंदे ने आगे वेग से चले रहे तूफान को देखा और मुस्करा कर बोला–
“मैं डाली के टूटने से नहीं डरता क्योंकि मुझे डाली पर नहीं अपने पंखों पर भरोसा है।”
इतना कहते ही नन्हा परिंदा अपने हौसले की उड़ान भरता उड़ चला नीले विशाल आकाश में जहां खुशियां उसकी चहचहाहट में गीत बन गूंज रही थी।
लेखक इंदौर की सुप्रसिद्ध लेखिका, साहित्यकार और रचनाकार डॉ. रंजना फतेपुरकर है ।
