विलीन होती संस्कारों की धरोहर

युवा - नशा - इंटरनेट और संस्कार को लेकर लेखक की खरी खरी ...

आज के आधुनिक युग में हर युवा अपनी अपेक्षाओं आकांक्षा के आसमान में चाहतों और ख्वाहिशों के पंख लगाकर उड़ना चाहता है।समाज में युवक -युवतियां नशे के आदि होते जा रहे हैं।क्या हम पाश्चात्य संस्कृति को कुछ ज्यादा नहीं अपना रहे!
जिंदगी एक बार मिलती है।इसे सिर्फ जी कर नहीं जीतकर गुजारो। हर युवा अपने मनचाहे मुकाम को ना पाकर डिप्रेशन का शिकार होकर गलत दिशा में चले जाते हैं और अपने परिवार की चिंता छोड़ वह आत्महत्या,हत्या जैसे जघन्य अपराध कर लेते हैं।
तब वह यह विचार नहीं करते। कि हमारे माता-पिता ने हमें 20 वर्षों तक जतन से हमें पाल पोसकर बड़ा किया है जिंदगी में माता-पिता ने लाखों कष्ट सहकर हमारे उज्जवल भविष्य की कामना कर हमारी हर ख्वाहिशों को पूर्ण करने में दिन-रात एक कर दिए।
हम उन्हें क्या देते हैं परेशानियां चिंता…!
ऐसे में युवा खुद तो अवसाद की दिशा में जाते ही है साथ में अपने परिवार को भी दुख देते है। प्रत्येक युवक-युवतियों को जीवन में एक मंत्र अपनाना चाहिए कि परिस्थितियां कैसी भी हो हम संघर्ष का सामना करेंगे! संघर्ष ही जीवन है ।

इंटरनेट का मकड़जाल और दुरुपयोग –

आज के आधुनिकीकरण में हमारे संस्कारों की धरोहर जैसे विलीन हो गई है। नैतिक मूल्यों का पतन हो गया है हम अपने घर्म के प्रति लापरवाह होकर आधुनिकरण को अपनाकर हम अपना हनन कर किस दिशा की ओर भाग रहे हैं। इसका ध्यान युवाओं को स्वयं ही रखना चाहिए। दोस्तों की संगत या दिखावे में अपने परिवारों से मिले संस्कारों को भूलते जा रहे है।
आज का युवा इंटरनेट के मकड़जाल में फंसा हुआ है। वैसे तो इंटरनेट का सभी इस्तेमाल करते हैंओर यह आज की आवश्यकता भी है लेकिन बढ़ते किशोर किशोरियों में इसका मिस यूज होता दिखाई दे रहा है आज की युवा लड़कियां भी जल्दी पब्लिसिटी पाने के चक्कर में उल्टे सीधे वीडियो बनाकर अश्लीलता की हदें पार करती हैं। यह कहां तक सही है। इन्हें खुद अपनी अस्मिता की चिंता नहीं है।यदि ऐसे में कोई हादसा होता है तो वह समाज और देश के नाम अपनी अस्मिता के ढिढोरे पिटती है लेकिन हम स्वयं क्या कर रहे हैं और कहां हैं क्या पहने हैं इसका स्वयं ध्यान रखा जाए तो समाज में बलात्कार जैसे अपराध अपने आप कम घटित होंगे!युवा नाइट पार्टी, पब नशा ,फैशन की इस आधुनिक दौर में दौड़कर अपनी व अपने परिवार की जिंदगी दांव पर लगा देते हैं।यह कहां तक उचित है!

देश – प्रगति और संस्कार –

आधुनिक विचारों को देश की प्रगति के लिए इस्तेमाल करे। अपनी तबाही के लिए नहीं! युवक-युवतियों को अपने मूल संस्कारों द्वारा देश की प्रगति में अपना योगदान देना होगा।जिससे हमारा देश अधिक प्रगति कर सकता है।क्योंकि आने वाले समय में देश की बागडोर युवाओं को ही संभालनी है। इसलिए इन्हें आपने संस्कारों द्वारा ही नई पीढ़ी का निर्माण करना है।देश को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। देश समाज के प्रगति के कार्यो में अपना पूर्ण योगदान देना चाहिए।

अति अच्छी नहीं होती है –

किसी भी वस्तु की अति अच्छी नहीं! यह बात आज के युवाओं को ध्यान में रखना चाहिए। हमारे देश की रक्षा सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ जवानों के कंघों पर ही निर्भर हो यह जरूरी तो नही। अन्य युवाओं को भी
अपने परिवार ,समाज और देश के प्रति कुछ दायित्व निभाना है इस बात का संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
– वंदना पुणतांबेकर , इंदौर

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