पेड़ तुमने काँटे – हरियाली तुमने उजाड़ी – जनता का क्या दोष..?

इंदौर लेखक की खरी खरी

इंदौर की जनता आखिर जाए तो जाए कहाँ…?

सवाल शहर की बर्बादी का नहीं, 

उस बर्बादी के लिए जिम्मेदार व्यवस्था की संवेदनहीनता का है!

फ्लाईओवर बनाने के लिए पेड़ तुमने काटे…

BRTS के नाम पर हरियाली तुमने उजाड़ी…

मेट्रो के नाम पर शहर की छाती से पेड़ों का सीना तुमने चीरा…

तालाबों में पानी पहुँचाने वाली प्राकृतिक जलधाराओं पर कॉलोनियों की परमिशन तुमने दी…

तालाब की जमीन पर कोर्ट निर्माण के फैसले तुमने लिए…

पहाड़ों से मुरम खोदने के ठेके तुमने दिए…

रानी सराय के तोतों का आशियाना तुमने उजाड़ा…

प्रकृति के साथ खिलवाड़ तुम्हारे फैसलों ने किया, 

और अब कुदरत अपना हिसाब माँग रही है, 

तो सजा जनता को क्यों…?

आखिर जनता का कसूर क्या है ?

क्या इस शहर की जनता ने पेड़ काटने के आदेश दिए थे ?

क्या जनता ने तालाबों की जलधाराओं पर कॉलोनियाँ बसाने की अनुमति दी थी ?

क्या जनता ने पहाड़ों को खोखला करने के ठेके बाँटे थे ?

नहीं!

फिर भी जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है, 

पानी की किल्लत होती है, 

सड़कों पर जाम लगता है, 

गर्मी बेहिसाब बढ़ती है, 

तो सबसे पहले प्रशासन की तलवार आम आदमी की गर्दन पर ही क्यों चलती है ?

गलतियाँ व्यवस्था करे, 

फैसले अफसर लें, 

और कीमत जनता चुकाए… 

आखिर यह कैसा न्याय है ?

साहब!

आप इस शहर में दो-चार साल रहेंगे..

कुर्सी के पॉवर में मदमस्त रहेंगे,

सरकारी गाड़ी, 

बंगला, सुरक्षा और अधिकारों के बीच अपनी नौकरी पूरी करेंगे…

फिर किसी दूसरे शहर में किसी दूसरे पद पर बैठकर व्यवस्था के मजे लेंगे…

लेकिन जिस शहर की हवा आपने बदली, 

जिस शहर की जमीन को आपने अपने फैसलों से प्रभावित किया, 

जिस शहर के प्राकृतिक संसाधनों के साथ आपने प्रयोग किए, 

उस शहर में तो जनता को ही रहना है!

आपका तबादला हो जाएगा, 

लेकिन इंदौर की जनता का क्या होगा ?

आपकी कुर्सी बदल जाएगी, 

लेकिन इस शहर की तकलीफें कौन बदलेगा ?

याद रखिए, 

अफसर का कार्यकाल अस्थायी होता है, 

लेकिन उसके फैसलों के परिणाम कई पीढ़ियों तक भुगतने पड़ते हैं

और सबसे बड़ी विडंबना देखिए…

जनता के चुने हुए विधायकों की बात तुम सुनते नहीं..

पार्षदों की शिकायतों को तुम तवज्जो देते नहीं…

जनता की आवाज तुम्हारे दफ्तरों की फाइलों में दबकर रह जाती है

तो आखिर यह जनता जाए तो जाए कहाँ ?

किसके सामने अपनी पीड़ा रखे ?

किसके सामने अपने अधिकारों की गुहार लगाए ?

किससे पूछे कि जिस शहर को वह अपना घर समझती है, 

उसी शहर में उसकी सुनवाई क्यों नहीं होती ?

क्या बड़ा अफसर बनते ही संवेदनाएँ मर जाती हैं ?

क्या ऊँची कुर्सी पर बैठते ही जमीन पर रहने वाले लोगों की तकलीफें दिखाई देना बंद हो जाती हैं ?

सड़क के गड्ढे में गिरकर कोई निर्दोष अपनी जान गँवा देता है, 

तो तुम्हारे चेहरे पर शिकन क्यों नहीं आती ?

भागीरथपुरा में दूषित पानी से लोगों की जान जाती है, 

परिवार उजड़ते हैं, 

घरों में मातम पसरा होता है, 

तो तुम्हारी आँखें नम क्यों नहीं होतीं है ?

क्या किसी की मौत तुम्हारे लिए केवल एक आँकड़ा है ?

क्या किसी परिवार का उजड़ना केवल एक रिपोर्ट है ?

क्या किसी माँ की गोद उजड़ने के बाद तुम्हारी जिम्मेदारी एक प्रेस नोट जारी करने तक सीमित रह जाती है ?

साहब, 

जनता को भाषण नहीं, 

जवाब चाहिए आश्वासन नहीं, 

समाधान चाहिए

और सबसे बढ़कर उसे एक ऐसी व्यवस्था चाहिए, 

जिसमें इंसान की जान की कीमत फाइलों से ज्यादा हो

अब पानी की बात कर लीजिए…

इस बार बारिश कम हुई, 

जलस्रोतों पर संकट आया, 

तो आपने बोरिंग पर प्रतिबंध लगा दिया

कल गाड़ी धोने पर रोक लगा देंगे…

परसों भवन निर्माण पर रोक लगा देंगे…

फिर शायद जनता को नहाने और पानी इस्तेमाल करने के तरीके भी समझाने लगेंगे!

लेकिन एक सवाल है…

जनता पर पाबंदियाँ लगाने से पहले क्या आपने अपनी जिम्मेदारियों का हिसाब दिया ?

कितने नए जलस्रोत विकसित किए ?

कितने पुराने तालाबों को पुनर्जीवित किया ?

कितनी बंद जलधाराओं को बहाल किया ?

वर्षा जल संचयन को कितनी गंभीरता से लागू किया ?

भविष्य की जरूरतों के लिए पानी का कितना ठोस इंतजाम किया ?

जनता को पानी बचाने की सीख देना गलत नहीं है

पानी की बर्बादी रोकना जरूरी भी है 

लेकिन जनता को दंडित करने और पानी की व्यवस्था करने में जमीन-आसमान का अंतर है

साहब, 

जनता को प्यासा रखकर जल प्रबंधन की सफलता के आँकड़े मत बनाइए जनता की प्यास बुझाकर अपनी कार्यक्षमता साबित कीजिए।

शहर में ट्रैफिक जाम है, 

तो उसका समाधान खोजिए।

ई-रिक्शा से अव्यवस्था है, 

तो व्यवस्थित रूट, 

निर्धारित स्टैंड और प्रभावी यातायात प्रबंधन लागू कीजिए

सड़कों पर गड्ढे हैं, 

तो उनकी जिम्मेदारी तय कीजिए

पानी का संकट है, 

तो जल प्रबंधन की जवाबदेही सुनिश्चित कीजिए।

पेड़ कटे हैं, 

तो केवल कागजों पर पौधारोपण का हिसाब मत दीजिए, 

उनकी जगह विकसित हुए पेड़ों का हिसाब भी दीजिए..

समस्या का समाधान प्रशासन का दायित्व है, 

समस्या से परेशान जनता को ही समस्या घोषित कर देना प्रशासन की विफलता है…

विकास के हम भी विरोधी नहीं हैं..

फ्लाईओवर बनें, 

मेट्रो चले, 

सड़कें चौड़ी हों, 

शहर आधुनिक बने

किसे आपत्ति होगी ?

लेकिन विकास का अर्थ यह तो नहीं कि शहर की साँसें छीन ली जाएँ!

विकास का अर्थ यह तो नहीं कि तालाबों की जमीन पर कंक्रीट बिछा दी जाए!

विकास का अर्थ यह तो नहीं कि प्रकृति की कीमत पर इमारतें खड़ी हों 

और फिर उसी प्रकृति के प्रकोप का सामना करने के लिए जनता को प्रतिबंधों के घेरे में खड़ा कर दिया जाए!

जिस विकास में प्रकृति के लिए जगह नहीं, 

उसमें भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जीवन की गारंटी भी नहीं

और अंत में, 

उन तमाम जिम्मेदार अधिकारियों से मेरा एक सीधा सवाल है

जब आप किसी आदेश पर हस्ताक्षर करते हैं, 

तो क्या केवल फाइल देखते हैं 

या उस फैसले का भविष्य भी देखते हैं ?

जब आप किसी निर्माण की अनुमति देते हैं, 

तो क्या केवल राजस्व और नक्शे देखते हैं 

या उस जमीन की प्राकृतिक संरचना भी समझते हैं ?

जब किसी शहर की जनता पानी, 

सड़क, यातायात और प्रदूषण से परेशान होती है, 

तो क्या आपको अपनी जिम्मेदारी याद आती है 

या आप नई पाबंदियों की सूची बनाने बैठ जाते हैं ?⁰

कुर्सी अधिकार जरूर देती है, 

लेकिन उस अधिकार से कहीं बड़ा दायित्व भी देती है..

याद रखिए, 

शहर केवल सीमेंट, 

कंक्रीट, 

सड़कों और इमारतों से नहीं बनता। 

शहर बनता है 

उसकी हवा से, 

उसके पानी से, 

उसकी हरियाली से और उसमें रहने वाले लोगों की उम्मीदों से।

इंदौर को स्मार्ट बनाने की कोशिश में कहीं ऐसा न हो कि शहर की इमारतें तो स्मार्ट हो जाएँ, 

लेकिन व्यवस्था अपनी संवेदनाएँ खो बैठे।

अब भी वक्त है।

जनता पर प्रतिबंध थोपने से पहले अपने फैसलों की समीक्षा कीजिए। 

दोषारोपण से पहले अपनी जवाबदेही तय कीजिए। 

और आदेश देने से पहले उस आम आदमी की जिंदगी में झाँककर देखिए, 

जो सुबह घर से निकलता है 

तो शाम को सुरक्षित लौटने, 

साफ पानी पीने और सम्मान से जीने की उम्मीद रखता है।

और साहब, 

एक बात हमेशा याद रखिए

प्रकृति के साथ अन्याय का हिसाब प्रकृति लेती है, 

लेकिन जनता के साथ अन्याय का हिसाब लोकतंत्र माँगता है।

 

इसलिए जनता को कटघरे में खड़ा करना बंद कीजिए।

 

पहले खुद से पूछिए

 

इस शहर को इस हालत तक पहुँचाने में हमारी भूमिका क्या रही, 

और अब इसे सँभालने के लिए हम क्या कर रहे हैं ?

यही सवाल है

यही जवाबदेही है 

और यही सुशासन की पहली शर्त है

( रानी सराय के बेजुबान तोतो को समर्पित )

✍🏻 देवेंद्र चौहान की कलम से

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