सार्वभौम

जलन असल में उस चोर की तरह है जो चुपके से, बिन बताए मन में घुस जाती है और भीतर कुंडी लगाकर बैठ जाती है। आप बेशक बाहर कितना ही पहरा लगा कर बैठे हों, एक बार इस चोर के मन में घुस जाने के बाद आप कुछ नहीं कर सकते। वह आपको अंदर से खोखला कर देता है। जलन वो जज़्बात है जो किसी पैकेज डील की तरह हमें मिलता है और इसके साथ आते हैं डर, दुख, गुस्सा जैसे तमाम दूसरे जज़्बात। व्यक्तित्व को बनाने-बिगाड़ने में इनका बड़ा हाथ होता है। कभी कोई जज़्बात हम पर हावी होता है तो कभी कोई। इनकी लगाम अपने हाथ में रखना जरूरी होता है। जलन भी ऐसा ही जज़्बात है जिसकी चौकीदारी करते रहना जरूरी है। चौकीदारी नहीं की तो यह सबसे ज्यादा नुकसान जलने वाले का ही करती है। जलन बुरी नहीं, बशर्ते आप इसे दुश्मन के बजाय दोस्त बना लें। यह आपके लिए एक आईने की तरह होती है। देखना चाहें तो यह हमें हमारा वह भीतरी चेहरा दिखा सकती है जो अक्सर हम देख नहीं पाते। यह हमें बता सकती है कि कौन सी चीजें, रिश्ते या बातें कद्र करने लायक हैं लेकिन यह संकेत तभी मिल पाता है जब आप चौकन्ने हों, अपने जज़्बात पढ़ना जानते हों, अपने स्याह पक्ष को देख आंखें न मूंद लेते हों। तब आप डिप्रेस होकर उनसे दूर नहीं जाते, उनके करीब रहने की, उन्हें पाने की कोशिश में जुट जाते हैं। मसलन, वो लड़की शायद जलने के बजाय अपनी पर्सनैलिटी और कम्यूनिकेशन स्किल को निखारने की कोशिश कर सकती थी। जलन के साथ असली मुश्किल इसमें नहीं कि आप उसे कैसे महसूस करते हैं, मुश्किल इसमें है कि आप उसके बाद कैसे रीऐक्ट करते हैं। जलन को कमजोरी बनाने के बजाय उसे ताकत बना लें तो कुछ रिश्तों की उम्र लंबी हो सकती है, कुछ उपलब्धियां समय पर मिल सकती हैं। जज़्बात कोई भी हो, वह तब तक अच्छा बुरा नहीं होता, जब तक अनियंत्रित न हो। तो जज़्बात को अच्छा बुरा समझना छोड़िए, उन्हें गले लगाइए, जलने का हौसला रखिए। सीखिए, बस जल मत जाइए।

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