शरद पूर्णिमा का ताज …आज चांदनी चल पड़ी

सुप्रसिद्ध कथाकार, रचनाकार और साहित्यकार डॉ. रंजना फतेपुरकर की शानदार पंक्तियां

नीले अम्बर में पूनम

का चांद झिलमिला रहा है 

सितारों के नूर से चांदनी

को संवार रहा है 

घनेरी घटाओं से काजल चुराकर चांदनी की आंखों में लगा रहा है 

कोहरे की झीनी चूनर से चांदनी का घूंघट सजा रहा है 

आज चांदनी चल पड़ी है 

ताज से मिलने के लिए

हर पूनम पर मिलने का

वादा निभाने के लिए

वो निहारेगी शुभ्रता के कमल को

जिसने साकार किया है 

प्यार के खूबसूरत पलों को

यमुना में पड़ता ताज का रोशन प्रतिबिंब

नूर की बूंदों का सैलाब लगता है 

ताज की मीनारों का अम्बर छू लेना

युगों से प्यार की कविता लिखता है 

आसमां का चांद चांदनी पर प्यार के सितारे लुटा रहा है 

और जमीं पर ताज प्यार का गीत गुनगुना रहा है 

मालूम नहीं पड़ता उस वक्त

चांद की रोशनी में ताज

नहाया है या

ताज के नूर में निखरकर

चांद झिलमिलाया है

चंद्र रश्मियों पे सवार हो

चांदनी जमीं पर उतर आई है 

यमुना में ताज की झलक पलकों में भरने आई है 

पर आज तक की शुभ्रता मलिन है 

ताज की आँखें दर्द से व्यथित हैं 

चांदनी ने पूछा

ताज क्यों उदास हो

तुम तो प्यार की खूबसूरत पहचान हो 

चाहत की शमा की रोशन दीपशिखा हो

ताज ने चांदनी को अपनी व्यथा सुनाई

इंसानों की हृदयहीनता की दास्तां सुनाई

इंसान अपने मन की कलुषता के धुएं से ताज को मलिन कर रहा है 

ताज के मासूम हृदय पर

संगीनों के पहरे रख रहा है

ये वो जगह है जहां एक

शहंशाह ने चाहत की शमा जलाई है 

अपनी मुमताज की याद में दुनिया महकाई है 

ताज की व्यथा सुन चांदनी की आंखों से ओस बिंदु अश्रु बन बहने लगे

ताज के दर्द की चुभन से

चांदनी के ज़ख्म रिसने लगे

चांदनी ने धरती को ताज की व्यथा सुनाई

और ताज का दर्द दूर करने की कसम दिलाई

धरती की भी आँखें नम हो आईं

ताज की व्यथा सुन धरती भी अकुलाई 

धरती ने कहा

सुनो चांदनी अब फिर ताज पर प्यार के गीत गुनगुनाए जाएंगे

ताज की शुभ्रता को हम नेह की रोशनी से सजाएंगे 

खुश हो भोर के तारे संग चांदनी लौट पड़ी

ताज को सजदा कर

अपने चांद के पास लौट 

चली

( लेखिका सुप्रसिद्ध रचनाकार, साहित्यकार और लघुकथाकार  डॉ रंजना फतेपुरकर इंदौर है  )

Leave A Reply

Your email address will not be published.