दिल्ली दरबार ‘ ने प्रदेश के किसी बड़े नेता से नही ली सहमति

मोदी शाह ने पहले ही बना लिया था खंडेलवाल को लेकर मन

_नए अध्यक्ष की ताजपोशी को अपने खाते में दर्ज कराने की हेरतभरी होड़_
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_न शिवराज-न श्रीमंत-न कोई ओर बड़ा नेता_
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सौ टंच ‘ मोहन ‘ के ‘ हेमंत ‘
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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के मनोनयन में अब ‘ श्रेय-पेय ‘ का ‘मैनेजमेंट’
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दिल्ली दरबार ‘ ने प्रदेश के किसी बड़े नेता से नही ली सहमति
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 अपने मोहन ‘ को निष्कंटक करने के लिए मोदी-शाह ‘ ने महीनों पहले बिछा ली थी बिसात
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खंडेलवाल तो बरसों से बैतूल में, आज उनसे नाता जोड़ने वाले बड़े नेताओं ने कभी जाना ही नही उनका ‘ पुरसाने हाल ‘
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नितिनमोहन शर्मा, इंदौर ।आज जो हेमंत खंडेलवाल से अपना आत्मीय नाता जोड़ रहें हैं, वे सबके सब नेता तब कहां थे, जब खंडेलवाल प्रदेश की भाजपाई राजनीति में बैतूल में अलग थलग पड़े हुए थे। बरसों से प्रदेश में भाजपा की सत्ता हैं, कितने नामचीन नेताओं ने उनका ‘ पुरसाने हाल ‘ जाना-समझा? जबकि बैतूल अंचल में कमलदल का झंडा खंडेलवाल परिवार के दमखम व पुरुषार्थ से फला-फुला व लहराया। बरसों-बरस की भाजपाई सत्ता में खंडेलवाल को कोई बड़ी भूमिका दी ही नही गई। सिवाय संगठन में एक मर्तबा कोषाध्यक्ष के, वे किसी बड़ी भूमिका में लिए चुने ही नही गए। न सत्ता में, न संगठन में। अगर खंडेलवाल को अपनी ही सरकारों में कोई पद-प्रतिष्ठा मिलती तो वे प्रदेश के बाशिंदों के लिए ‘ अननोन पर्सन ‘ होते? पार्टी गलियारों में ‘ लो-प्रोफाइल ‘ नेता का तमगा पाते? आज खंडेलवाल के इस मुक़ाम तक पहुँचने के बाद हर कोई नेता उनसे आत्मीय नाता जोड़ रहा हैं लेक़िन ये सार्वभौम सत्य हैं कि प्रदेश भाजपा के नूतन अध्यक्ष सिर्फ औऱ सिर्फ़ मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की खोज ही नही, पसंद भी हैं। नए अध्यक्ष ‘ सो टंच’ सिर्फ़ ‘ मोहन ‘ के हैं।*_

_खंडेलवाल के अध्यक्ष बनते ही राजधानी में ये ‘ जँचाने ‘ का ‘ मैनेजमेंट ‘ शुरू हुआ हैं कि इस भागीरथी फैसले के पीछे हम भी हैं। हमारी भी रजामंदी इस निर्णय में शामिल है। हमसे भी पूछा गया। अब ये तो सामान्य सी समझ की बात हैं कि जो ‘ दिल्ली दरबार ‘ तमाम क्षत्रपों की उपस्थिति के बाद भी प्रदेश में नए नवेले डॉ मोहन यादव को मुख्यमंत्री मुकर्रर कर देता हैं, वह प्रदेश अध्यक्ष के निर्णय में उन्ही नेताओ के राय मशविरे से प्रदेश अध्यक्ष का चयन करेगा, जिन्हें उन्होंने बमुश्किल ‘ जमा ‘ किया। ‘ दिल्ली ‘ को जरूरत ही क्या इस तरह की रजामंदी की? क्या प्रदेश से जुड़े किसी नेता से डॉ मोहन सरकार को कोई ख़तरा हैं या किसी की गहरी नाराज़गी हैं मुख्यमंत्री से? या कोई मतभेद सतह तक उभरे? या किसी ने कोई खुली चुनोती दी? कोई पार्टी लाइन से हटकर सरकार व सरकार के मुखिया के ख़िलाफ़ कुछ बोला-बका?_

_ये तो तय ही था कि प्रदेश भाजपा में इतने सारे दिग्गज नेताओं के बावजूद डॉ मोहन यादव का चयन नेताओं को असहज करेगा ही और ये असहजता व अनमनापन जाते जाते ही जायेगा। लिहाज़ा दिल्ली के लिए प्रदेश में कोई ऐसा बड़ा ‘ संकट ‘ सन्निकट नही था कि वह संगठन मुखिया के चयन में प्रदेश से जुड़े किसी बड़े नेता, केंद्रीय मंत्रियों से नाम की मंजूरी ले। उलटे ‘दिल्ली दरबार’ तक तो इस बात के पुरजोर प्रयास चल रहे थे कि ‘ मोहन ‘ को एकदम से इतना ‘ फ्रीहैंड ‘ न देवे। बड़े नेताओं की परस्पर मेल-मुलाकात क्या मुख्यमंत्री की पसन्द का प्रदेश अध्यक्ष बनवाने के लिए हो रही थी? सब जानते हैं कि प्रदेश से जुड़े बड़े नेताओं के प्रयास तो मुख्यमंत्री के तेजी से बढ़ते कदम थामने में ही थे।_

_लेक़िन जैसे ही दिल्ली ने मुख्यमंत्री की पसंद पर मुहर लगाई, कुछ बड़े नेताओं ने फ़ौरन सुर बदल लिया और खंडेलवाल की शान में कशीदे पढ़ना शुरू कर दिया। सरकारी योजनाओं के फैसले का आदर्श तक खंडेलवाल को मानने के दावे शुरू हो गए कि फलानी योजना का श्रेय इन्ही को हैं। यहां तक कहा व कहलवाया गया कि इस फैसले में हमसे भी पूछा गया और हमारी सहमति के बाद ये निर्णय सामने आया। है न हैरत की बात? इससे अच्छे तो वे नेता रहे जिन्होंने इस फैसले की जानकारी मिलते ही स्वयम को पहले दिन उस मजमें से दूर रखा, जो ‘ श्रेय-पेय ‘ की लड़ाई के लिए बना था। ऐसे नेताओं ने कम से कम ये जँचाया तो नही की हमसें भी पूछा गया। न ये नेता ‘ चलती गाड़ी ‘ में उन नेताओं जैसे सवार हुए, जिन्हें जब तब फ़िर से एमपी की सत्ता की सवारी आती हैं। इन नेताओं ने आलाकमान तक अपनी नाराज़गी तो पहुचाई। बजाय श्रेय लेने के। जबकि ये सब जानते है कि पहले ही दिन से मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का एक ही नाम था- हेमंत खंडेलवाल। अब इस नाम के साथ सब अपना नाम व नाता जोड़े तो वो…’ मोहन की बला से’।_

( लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार नितिन मोहन शर्मा है)

सोर्स – नितिनमोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

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