” गुलाबी अहसास “

गुलाबी सुबह की गुलाबी धुंध में सुर्ख़ गुलाबों के महकते ही
रेशमी पलकों की देहलीज़ पर जब तुम्हारे
खूबसूरत ख़्वाब जाग जाते हैं
तुम्हारे गुलाबी अहसास
सिरहाने आकर ठहर जाते हैं
और मैं तलाशती रहती हूं
तुम्हारी गुलाबी यादों को
झीने कोहरे के धुआं धुआं बादलों में
डरता है मन कहीं
तुम खो न जाओ रोशनी
के धुंधले साए में
पर फिर मखमली रात झिलमिलाती चांदनी के साए में ख़्वाबों की देहलीज़ पर हौले से दस्तक देती है
और तुम्हारे खयाल पलकों की देहलीज़ पर
फिरसे आकर ठहर जाते हैं
लेखक – रंजना फतेपुरकर
