कलियुग में श्रद्धा के नाम पर पाखंड और प्रदर्शन की अधिकता

इंदौर हम सबका जीवन श्रद्धा और विश्वास रूपी दो स्तंभों पर टिका है। किस व्यक्ति में कितनी श्रद्धा है या किस पर कितना विश्वास किया जाए, इसे मापने का कोई पैमाना नहीं है। कलियुग में श्रद्धा के नाम पर पाखंड और प्रदर्शन की अधिकता देखने को मिलती है। लोग तीर्थ भी जाते हैं तो धर्म का भाव कम, पिकनिक का भाव ज्यादा होता है। तीर्थ स्थलों पर भी लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, जो हमारी संस्कृति और परंपरा को लांछित करने वाला होता है। गंगा में डुबकी लगाकर पाप मुक्त हुआ जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम रोज पाप करें और डुबकी लगाकर मुक्त हो जाएं।
यह बात नरसिंहपुर के आचार्य पं. अशोक शास्त्री ने रोबोट चौराहा स्थित पुष्प दंतेश्वर महादेव मंदिर गणेश नगर में कही। वे श्रावण मास में आयोजित महाशिवपुराण कथा में संबोधित कर रहे थे। मनोहारी भजनों की प्रस्तुतियों के बीच पं. शास्त्री ने कहा कि शिव-पार्वती का विवाह चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में हरिद्वार के कनखल में हुआ। आज भी वहां स्नान करने पर कुंवारी कन्याओं के विवाह जल्द हो जाते हैं। शिव और पार्वती का विवाह श्रद्धा और विश्वास का समन्वय है। हम गृहस्थ लोगों के बीच भी श्रद्धा और विश्वास की बुनियाद पर ही गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ती है। – पं. शास्त्री ने कहा कि हमारे धर्म स्थल जाने-अनजाने में हुए अनुचित एवं पाप सम्मत कर्मों से मुक्ति के माध्यम हैं, लेकिन आजकल लोग तीर्थ यात्रा भी पिकनिक की तरह करने लगे हैं। हम जब तक नर में नारायण के दर्शन का भाव नहीं रखेंगे तब तक हमारी साधना अधूरी ही रहेगी। गंगा में स्नान से सब तरह के पापों से मुक्ति हो सकती है, लेकिन हम रोज पाप करें और रोज गंगा में डुबकी लगाकर पाप मुक्त हो जाएं, यह भी संभव नहीं है। कथा 6 अगस्त तक चलेगी।

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