मुझे सुर्ख गुलाब नही होना

 

मुझे सुर्ख़ ग़ुलाब नही होना

फीका पड़ जाता है न

किताब बनकर भी क्या करूँगी

नहीं चाहती कि कोई मुझे पढ़ सके

 

मौसम से मेरी तुलना क्यूँ करते हो

सब बदल जाते हैं न वक़्त वक़्त पर

 

हाँ समंदर सा गहरा होना है मुझे

जिसकी गहराई कोई नाप न सके

अब कोई ऐसा रहबर भी नहीं चाहिए

जो मेरे जज़्बात भांप सके

 

लेखिका – कीर्ति सिंह गौड़ , इंदौर

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